दुनिया की तिजोरियों पर सालों से राज करने वाले डॉलर के दिन अब ढलने वाले हैं। रूस से ओमान तक और मॉरीशस से दुबई तक, भारत अब अपनी शर्तों पर व्यापार कर रहा है। यह कहानी भारत के ग्लोबल ‘सुपरपावर’ बनने के संकल्प की है।
दशकों से अंतरराष्ट्रीय बाजार का एक ही उसूल रहा है- तेल खरीदना हो या कर्ज चुकाना, डॉलर ही सर्वोपरि है। लेकिन साल 2025 वैश्विक अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक बड़े मोड़ के रूप में दर्ज होने जा रहा है। भारत ने अब चुपचाप एक ऐसी बिसात बिछाई है, जिसमें डॉलर की बादशाहत को सीधी चुनौती मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया ओमान यात्रा से लेकर रूस के साथ हुए ऐतिहासिक समझौतों तक, भारतीय रुपया अब सरहदों की जंजीरें तोड़कर एक वैश्विक मुद्रा बनने की राह पर है।
डॉलर के बिना व्यापार करने की लिस्ट में ओमान का भी नाम
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी की ओमान यात्रा ने डॉलर-मुक्त व्यापार (De-dollarization) की मुहिम को एक नई ऊर्जा दी है। भारत और ओमान अब इस बात पर सहमत हो गए हैं कि वे अपने द्विपक्षीय व्यापार में डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं का उपयोग करेंगे। इस समझौते के तहत भारत अब ओमान से आने वाले खजूर, गोंद और इत्र जैसे उत्पादों को शुल्क-मुक्त पहुंच देगा। बदले में ओमान, भारत से भारी मात्रा में पशु उत्पाद और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ खरीदेगा। यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि एक नए आर्थिक युग की आहट है जहां ‘लोकल’ ही ‘ग्लोबल’ है।
रूस के साथ ‘रुपया-रूबल’ का जादू: 96% व्यापार अब डॉलर से मुक्त
भारत और रूस के बीच जो हुआ, उसने पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को हैरान कर दिया है। दिसंबर 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच होने वाला 96% वाणिज्यिक लेन-देन अब उनकी राष्ट्रीय मुद्राओं में हो रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों और SWIFT सिस्टम की बाधाओं के बीच भारत ने न केवल अपना रास्ता निकाला, बल्कि 2030 तक 100 अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य भी रख दिया। यह साबित करता है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो डॉलर के बिना भी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हाथ मिला सकती हैं।
मॉरीशस बना अफ्रीका का द्वार: ‘रुपया गेटवे’ की मास्टर प्लानिंग
भारत की रणनीति सिर्फ पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं है। मॉरीशस में ‘INR क्लियरिंग सेंटर’ की स्थापना करना भारत का एक मास्टरस्ट्रोक है। इसके जरिए भारत पूरे अफ्रीकी महाद्वीप में अपनी मुद्रा की पैठ बनाना चाहता है। मॉरीशस अब अफ्रीका के लिए एक वित्तीय पुल का काम करेगा, जिससे भारतीय रुपया पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के बाजारों में आसानी से घूमेगा। यह चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने और अफ्रीका के साथ गहरे आर्थिक संबंध जोड़ने की एक बड़ी भू-राजनीतिक जीत है।
